Durga Chalisa | दुर्गा चालीसा
माँ दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप हैं। उनकी स्तुति न केवल मन को शांति देती है, बल्कि जीवन के संघर्षों में विजय प्राप्त करने का आत्मबल भी प्रदान करती है।
क्या आप व्यस्त हैं? माँ दुर्गा की भक्ति में लीन होने के लिए ‘दुर्गा चालीसा’ यहाँ सुनें (Audio)
श्री दुर्गा चालीसा क्या है?
श्री दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की स्तुति में रचित 40 चौपाइयों का एक सिद्ध संग्रह है। सरल हिंदी और अवधी मिश्रित भाषा में होने के कारण यह जन-मानस के लिए अत्यंत सुलभ है।
इसमें माँ के विभिन्न स्वरूपों (काली, लक्ष्मी, सरस्वती) और उनके द्वारा किए गए असुर संहार का वर्णन है, जो भक्त के भीतर के ‘अंधकार’ को मिटाने का प्रतीक है।
दुर्गा चालीसा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
सनातन परंपरा में माना जाता है कि मंत्रों का उच्चारण कठिन हो सकता है, लेकिन ‘चालीसा’ भाव प्रधान होती है। यह साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (Aura) निर्मित करती है।
मार्कण्डेय पुराण के देवी कवच की भांति ही चालीसा का पाठ भी जातक की आकस्मिक विपदाओं से रक्षा करता है।
दुर्गा चालीसा पाठ की सही विधि (Step-by-Step)
शास्त्रों के अनुसार, किसी भी पाठ का फल उसकी श्रद्धा और विधि पर निर्भर करता है। यदि आप नियमपूर्वक पाठ करते हैं, तो सकारात्मक ऊर्जा का संचार शीघ्र होता है।
- समय: सबसे उत्तम समय ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सुबह 4 से 6 बजे) या संध्या काल (गोधिली बेला) है।
- दिशा: पाठ करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। उत्तर दिशा शक्ति की दिशा मानी जाती है।
- आसन: लाल रंग का ऊनी आसन सबसे श्रेष्ठ है। यदि उपलब्ध न हो, तो किसी साफ कुशा या सूती आसन का प्रयोग करें। सीधा जमीन पर बैठकर पाठ न करें।
- दीप और अगरबत्ती: माँ के सम्मुख गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। यदि संभव हो, तो एक कलश में जल भरकर रखें।
- शुद्धता: तन की शुद्धि (स्नान) के साथ मन की शुद्धि भी अनिवार्य है। पाठ के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें।
दुर्गा चालीसा पढ़ने के अद्भुत लाभ
- मानसिक लाभ: यह तनाव और अवसाद (Anxiety) को कम कर चित्त को शांत करती है। एकाग्रता बढ़ती है।
- आध्यात्मिक लाभ: कुंडली शक्ति के जागरण में सहायक है और साधक का जुड़ाव ईश्वरीय चेतना से गहरा होता है।
- सांसारिक लाभ: घर से दरिद्रता का नाश होता है, शत्रुओं पर विजय मिलती है और रुके हुए कार्य सिद्ध होते हैं।
चालीसा कितनी बार और कब पढ़ें?
- सामान्य दिनों में एक या तीन बार पाठ करना पर्याप्त है।
- विशेष मनोकामना सिद्धि के लिए नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन 11 बार पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है।
- यदि आप संकट में हैं, तो मंगलवार या शुक्रवार को इसका पाठ अवश्य करें।
सावधानियाँ: कौन लोग पाठ न करें?
सनातन धर्म में भक्ति सबके लिए है, लेकिन कुछ मर्यादाएं अनिवार्य हैं:
- अशुद्ध अवस्था (जैसे सूतक या मासिक धर्म के दौरान) में विग्रह का स्पर्श न करें, मानसिक पाठ कर सकते हैं।
- तामसिक भोजन (मांस-मदिरा) का सेवन करने के तुरंत बाद पाठ न करें।
- पाठ के बीच में उठें नहीं और न ही किसी से बात करें।
दुर्गा चालीसा (मूल पाठ)
(यहाँ श्रद्धापूर्वक माँ का ध्यान करते हुए पाठ आरम्भ करें)
दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुंलोक में डंका बाजत॥
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ संतन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥
अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें।
रिपू मुरख मौही डरपावे॥
शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।
जब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥
(उपरोक्त दिए गए पूर्ण पाठ का श्रद्धा से वाचन करें)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
परंपरागत रूप से शारीरिक शुद्धि को महत्व दिया जाता है, इसलिए इन दिनों में पुस्तक को स्पर्श न करें। आप मोबाइल से या कंठस्थ (याद) पाठ ‘मानसिक’ रूप से कर सकती हैं।
हाँ, यदि आप यात्रा में हैं या ऐसी जगह हैं जहाँ दीपक संभव नहीं, तो केवल श्रद्धा के साथ किया गया मानसिक पाठ भी माँ स्वीकार करती हैं।
जी हाँ, शक्ति की उपासना रात्रि में विशेष फलदायी होती है। विशेषकर ‘निशिता काल’ में।
श्री दुर्गा चालीसा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि माँ भगवती से जुड़ने का एक जीवंत माध्यम है। यदि आप इसे पूर्ण विश्वास और शरणागति के भाव से पढ़ते हैं, तो माँ की कृपा आपके जीवन के हर अंधकार को मिटा देगी।